मुसलमानों में अजीब ज़ेहनियत…शादी मस्जिद में… रिसेप्शन में डीजे,आर्केस्ट्रा ….

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बेलगाम शहर ही नहीं बल्कि मुख़्तलिफ़ शहरों में ये देखा जा रहा है के शादी तो माशाअल्लाह मस्जिद में हो जाती है.मस्जिद में दाखिल होते वक़्त दूल्हे साब बिलकुल इस्लामी लिबास में नज़र आते है.मस्जिद में मिम्बर ए रसूल से खुतबा भी दिया जाता है.लेकिन अचानक वलीमा,रिसेप्शन में हज़ारो-लाखो रुपये खर्च कर के नाच-गाना ऑर्केस्ट्रा बजाया जाता है.यहाँ तक के छोटे मोहोल्ले में भी इस तरह की खुराफात देखने में आती है.लिहाज़ा हम अल्लाह और रसूल सल० के मुजरिम बनने में कोई शर्म महसूस नहीं करते. अपने आप को अच्छे दीनदार समझनेवाले भी इस खुराफात में शरीक रहते है.ऐसा लग रहा है के मुसलामानों का अमल या कहिये के दीनदारी दोगली नज़र आ रही है.सिर्फ मामला यहाँ तक ना रहते हुए महंगे होटलों में दूल्हा दुल्हन के लिए पहली रात गुज़ारने के लिए रूम बुक किये जाते है.किस तरह की बेशर्मी बढ़ती जा रही है इसका अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता.

 

orchestra
होटलों में, शादी हॉल में वलीमा कम रिसेप्शन रखा जाता है.और यहाँ पर ऐसी हरकतों को अंजाम दिया जाता जो गैरमुस्लिम भी नहीं करते.सबसे बड़ा फितना तो मुसलामानों में दौलत ही नज़र आ रही है.दौलत नहीं थी तो मुसलामानों की कैफियत अलग थी लेकिन पैसे ने मानों दीनदारी का मफमून ही बदल दिया है,नयी नस्ल ऐसे बनी हुयी है के मस्जिद में नज़र भी आती है तो दूसरे लम्हे इन्हें नाच गाने का भी शौक है.
मस्जिदों में शादी या निकाह करना अब आम बात बनती नज़र आ रही है.लेकिन इसके साथ गाना-बजाना आर्केष्ट्रा डीजे की भी रस्म गली मोहोल्ले से लेकर बड़े महंगे होटलों तक फ़ैल गयी है.
कई गरीबों की शादियों में भी डीजे बजाने की रस्म परवान चढ़ती नज़र आ रही है.मोहोल्ले के लोगों की रात में नींद हराम कर देते है जब के तमाम हराम कामों को अंजाम देने में रत्ती भर की शर्म नहीं आती.सवाल पूछने के लिए या आवाज़ को कम करने के लिए कहा जाय तो हाथापाई पे उतर आनेवालों की भी कमी नहीं है.
लिहाज़ा अब भी वक़्त है मोहोल्ले के ज़िम्मेदार या जमात के ज़िम्मेदाराना इस में दखल दे अगर कोई इस पर बहस करता है तो जमात से बेदखल करने तक के सख्त फैसले लिए जाय.क्यों के ना तो इस तरह की खुराफात की इस्लाम ने इजाज़त दी है और ना ही किसी दूसरों को शादी के बहाने गाने-बजने को लेकर तकलीफ दी जा सकती है.
मुस्लिम मआशरे की बुरायिओं पर जितना भी मातम करे उतना कम ही है.बहरहाल शादी के बहाने घर की औरतों को भी नाचने-गाने से आरास्ता करे इससे बढ़ कर उम्मत के लिए क्या ज़िल्लत की बात हो सकती है…?क्या हमारा खुदा हमसे खुश हो जाएगा..क्या ऐसे मामलात से आनेवाली नस्ल में अल्लाह के वली पैदा हो सकेंगे…? हमसब को ये समझने की ज़रूरत है.

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