इस्लाम_और_अमन_★★सुल्तान सलाउद्दीन अयूबी का वाक़िया…

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★★#इस्लाम_और_अमन_★★
जब जंग के दौरान दुश्मन खेमे से रात के अँधेरे में एक और सुल्तान सलाउद्दीन के पास आई और…
सुल्तान सलाउद्दीन की फ़ौज ईसाई फ़ौज से टक्कर ले रही थी. दुश्मनों के जवान, बूढ़े, औरतें सभी मैदाने जंग में निकल पड़े थे और जंग जारी थी. इधर मुसलमानों को फ़ौज के खेमे लगे हुए थे और ये लोग पूरी बहादूरी के साथ दुश्मनों का मुकाबला कर रहे थे।
इस जंग की एक रात का वाकीया है, जब के हर तरफ सन्नाटा छा चुका था। और सुल्तान सलाउद्दीन और उनके साथी सो चुके थे के अचानक एक औरत ईसाइयों के खेमे से चीखती पुकारती हुई, फ़ौज और पहरे दारों के दरमियान से गुजरती हुई मुसलमानों के खेमे तक पहुंची.
जहां उसको फ़ौज के अफसर ने रोक लिया और पूछा: कहाँ जा रही हो ? उसने पूरी कुव्वत से जवाब दिया सुल्तान सलाउद्दीन को तलाश करती हूं. औरत को सुल्तान सलाउद्दीन के पास ले जाया गया तो वह सो रहे थे. इन को लोगो ने जगा दिया और कहा कि एक मज़लूम औरत आप से कुछ कहने आई है. उस वक्त इस्लामी लश्कर के तमाम बड़े बड़े सरदार सो रहे थे.
सुल्तान सलाउद्दीन ने उन सब को जगा दिया और औरत निहायत महरबानी और नरमी के साथ पूछा: क्या बात है ? औरत रोने लगी और फिर चीखकर बोली के: ऐ बादशाह! आप की फ़ौज से मुझ को सख्त शिकायत है, सुल्तान सलाउद्दीन के चहरे का रंग उड़ गया और पूछने लगे: मेरी फ़ौज ने क्या किया है ? औरत ने जवाब दिया: “कल आप के इन सिपाइयों ने मेरे शौहर को गिरफ्तार कर लिया तो मैने कहा के चलो ख़ुदा की राह में पकड़ा गया और आज रात को अभी कुछ घँटे पहले आप की फ़ौज के कुछ डाकू मेरी महबूब बच्ची को उठाकर ले गए. ये बच्ची मेरी तस्सली का सामान था और अपने बाप की गिरफ्तारी के बाद मेरा सब कुछ वही था,
इस वक़्त में आप से सिर्फ अपनी प्यारी बच्ची को चाहती हूं, वरना आप ख्याल रखे भी के इस फ़ौज की सारी हरकतों और कामों के जिम्मेदार आप ही है, और जोश में कहने लगी। ए काफिरों! में अपनी बच्ची को तुमसे मांग रही हूं. औरत का मिज़ाज देखकर और उसकी बातें सुन कर सुल्तान सलाउद्दीन खामोश हो गए, और फ़ौज को हुक़्म दिया के फौरन लश्कर छानवीन करो और इसके करीब की जगाहों से इस औरत की बच्ची को तलाश करके ले आए.
थोड़ी देर बाद फ़ौज वाले कुछ अजनबी डाकुओं को पकड़ कर ले आए, जो बच्ची को ले गए थे, औरत बच्ची को देखकर उछल पड़ी और उसको अपने सीने से चिमटा लिया और उसके चहरे का बोसा लेने लगी और मोहब्बत के गर्म गर्म आंसू उसकी आँखों से निकल कर बच्ची के रुखसार पर गिरने लगे. अब औरत को सुकून हासिल हो चुका था और वह सुल्तान सलाऊद्दीन की तरफ मुतवज्जे हो कर शुक्रिया अदा करने लगी।
लेकिन सुल्तान सलाऊद्दीन ने थोड़ी देर के लिए उससे मोहलत चाही और उसके कैदी शोहर को तलब करके उसी वक्त उसको रिहा कर दिया और कहा. जाओ! अपने सरदारों से हमारे मुताल्लिक़ कह दो के हम ज़ालिम और सरकशी नही बल्के रहम करतें है, हमें लड़ाई करने और तबाही फैलाने के लिए नही पैदा किए गए, बल्कि हमारा मकसद अमन और सलामती क़ायम करना है.
हमारा दिन ऐतफ़ाक़ सिखाता है, दिलों को आपस मे मिलाता है, भाइयों के दरमियान फुट नही पैदा करता और न दिलों में कही अदावत का बीज डालता है, अपने इन बड़े सरदारों से कह दो के हम इस अखलाक के बदौलत कामयाब होंगे और येही दिन हमारी फतह का पेश खेमा है। सुल्तान सलाऊद्दीन ये कह कर उठने वाले थे के यह दोनों मियां बीवी पूरे जोश व खरोश के साथ ये नारे बुलंद करने लगे के तुम्हारे यहां रहम और इंसाफ है, और हमारे पास सख्त दिली और ज़ुल्म है, और फिर कहा के हम को भी इस रहमत और इंसाफ की फ़ौज में दाखिल कर सकतें हो

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